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Sunday 18 April 2010

An article worth reading from Mr. Prasoon Joshi हर चीज में हमें मसाला चाहिए

प्रसून जोशी Sunday April 11, 2010

हाल में ही जब आखिर हमारी आदत हर चीज में मसाला ढूंढने की क्यों हो गई है? पिछले कॉलम में भी मैंने यही सवाल उठाया था कि क्रिकेट भी तमाशा बनकर रह गया है। इन तमाम तमाशों की चकाचौंध के बीच हमारी आदर्श शख्सियतें खो-सी गई हैं। लेकिन इसके लिए अकेले नई पीढ़ी को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। मीडिया भी बराबर का जिम्मेदार है। उदाहरण के लिए इन दिनों सानिया मिर्जा के व्यक्तिगत मामले को प्रेस में बड़े-बड़े मुद्दों से जगह मिल रही है। ज्यादा टीआरपी भी मिल रही है। मैं जानकारी देने का विरोधी नहीं हूं लेकिन उसे रिऐलिटी शो में बदलने के खिलाफ हूं। इससे यह भी साबित होता है कि हमें औरों की जिंदगी में झांकना पसंद है। जहां भी मसाला परोसा जा रहा है, हम उसे अंगीकार कर रहे हैं। जाहिर है, भारतीय संस्कृति कमजोर साबित हो रही है।



लेकिन इस मजेदार की लिमिट क्या होगी, यह काफी अहम सवाल है। आखिर किस-किस चीज में मजा ढूंढेंगे हम? कल को बच्चे स्कूल कोर्स में मजा ढूंढने लगे और कहने लगे कि इन किताबों को पढ़ने में मजा नहीं आ रहा तो क्या होगा? अगर मजा और आनंद ही एकमात्र मकसद रह हया है तो काफी शोचनीय है। और हर जगह ऐसा हो रहा है। गंभीर विषय अब 'चाटू' और 'पकाऊ' बन गए हैं। ऐसे समाज का निर्माण हो रहा है, जो गंभीर मुद्दों से दूर भागता है और हर वक्त मनोरंजन चाहता है।

हमें अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए लेकिन हम ऐसा नहीं कर रहे हैं। अगर कोई चैनल हमें अश्लील और ओछी चीजें दिखाता है तो उसे नाकामयाब हो जाना चाहिए। अगर हमारे वैल्यू सिस्टम उससे मेल नहीं खाता तो उसे बंद हो जाना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा। अगर कोई गलत काम कर रहा है और आप खिड़की खोलकर उसे निहारते रहते हैं तो कहीं-न-कहीं आप उसे सहमति दे रहे हैं।

हमें सामने परोसी गई हर चीज को स्वीकार नहीं करना चाहिए। हमारे देश में कला और संस्कृति का मतलब बॉलिवुड होता जा रहा है। लोककला, शास्त्रीय संगीत और लोकनृत्य खत्म हो रहे हैं। तर्क वही दिया जा रहा है कि लोगों को दिलचस्पी नहीं है। सच यही है कि बच्चों को 'मसालेदार' देखने और सुनने की आदत बनती जा रही है। इससे एक ऐसे समाज का निर्माण हो रहा है, जो अपनी धरोहर खोता जा रहा है। मुझे तो दूरदर्शन के वे दिन अच्छे लगते थे, जब टीवी पर राष्ट्रीय संगीत या नृत्य देखने को मिलता था। न्यूज में भी एक तहजीब और आचार संहिता होती थी। लेकिन अब ऐसा नहीं है।

लोग तमाम तरह की छूट स्वतंत्रता के नाम पर ले रहे हैं लेकिन स्वतंत्रता का मतलब देश की संस्कृति को नष्ट करना नहीं है। आप विचारों में स्वतंत्र हों, सर्वशिक्षा की वकालत करें, जात-धर्म से आजादी को समर्थन दें, मेहनत के मूल्य को समझें तो वास्तव में स्वतंत्रता के हिमायती होंगे। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि जो खूबसूरत है, उसे नष्ट कर दें। इससे बचने के लिए समाज में एक फिल्टर की जरूरत है। जनता की दिलचस्पी, संस्कार और मर्यादाएं फिल्टर का करेंगी। अगर कोई शख्स सीमाओं का उल्लंघन करे, मर्यादा या संस्कृति का सम्मान नहीं करे तो उसे नकारने की हिम्मत होनी चाहिए। फिर चाहे, वह शख्स मीडिया में हो, राजनीति में हो या फिर आम जिंदगी से जुड़ा हो। इससे उसे भी इस बात का अहसास हो जाएगा कि अगर मैं ऐसा करता हूं तो समाज मुझे बहिष्कृत कर देगा।

युवाओं को खासतौर पर आगे आने की जरूरत है। देश का बड़ा हिस्सा युवा है। युवाओं के अंद��� बड़ी ताकत होती है। अगर वे सिर्फ उपभोक्ता बनने से इनकार कर दें तो ऐसा मुमकिन है। इसके बाद हमें सानिया के खेल में दिलचस्पी होगी, न कि इसमें कि वह क्या पहनती है, किससे शादी करती है, क्या खाती है? आखिर गांधीवाद को गांधीगीरी बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? शायद इसलिए कि बिना मसाले के हम कुछ समझना ही नहीं चाहते। असल में हम अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। अगर करें, तो हम सब मिलकर एक ऐसा समाज बना सकते हैं, जहां हमारी तहजीब, विचार, संस्कार भूमिका निभाए, न कि मसाला।

5 comments:

  1. हिन्दी ब्लॉगजगत के स्नेही परिवार में इस नये ब्लॉग का और आपका मैं ई-गुरु राजीव हार्दिक स्वागत करता हूँ.

    मेरी इच्छा है कि आपका यह ब्लॉग सफलता की नई-नई ऊँचाइयों को छुए. यह ब्लॉग प्रेरणादायी और लोकप्रिय बने.

    यदि कोई सहायता चाहिए तो खुलकर पूछें यहाँ सभी आपकी सहायता के लिए तैयार हैं.

    शुभकामनाएं !


    "टेक टब" - ( आओ सीखें ब्लॉग बनाना, सजाना और ब्लॉग से कमाना )

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  2. आपका लेख पढ़कर हम और अन्य ब्लॉगर्स बार-बार तारीफ़ करना चाहेंगे पर ये वर्ड वेरिफिकेशन (Word Verification) बीच में दीवार बन जाता है.
    आप यदि इसे कृपा करके हटा दें, तो हमारे लिए आपकी तारीफ़ करना आसान हो जायेगा.
    इसके लिए आप अपने ब्लॉग के डैशबोर्ड (dashboard) में जाएँ, फ़िर settings, फ़िर comments, फ़िर { Show word verification for comments? } नीचे से तीसरा प्रश्न है ,
    उसमें 'yes' पर tick है, उसे आप 'no' कर दें और नीचे का लाल बटन 'save settings' क्लिक कर दें. बस काम हो गया.
    आप भी न, एकदम्मे स्मार्ट हो.
    और भी खेल-तमाशे सीखें सिर्फ़ "टेक टब" (Tek Tub) पर.
    यदि फ़िर भी कोई समस्या हो तो यह लेख देखें -


    वर्ड वेरिफिकेशन क्या है और कैसे हटायें ?

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  3. Manvendra ji,
    bahut achchha lekh padhavaya apne .is vishaya par to ham sabhee ko vichar karane kee jaroorat hai....sundar lekh. Prasoon ji,aur apko hardik shubhkamnayen.

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  4. कली बेंच देगें चमन बेंच देगें,

    धरा बेंच देगें गगन बेंच देगें,

    कलम के पुजारी अगर सो गये तो

    ये धन के पुजारी वतन बेंच देगें।

    हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में राज-समाज और जन की आवाज "जनोक्ति "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . नीचे लिंक दिए गये हैं . http://www.janokti.com/ , साथ हीं जनोक्ति द्वारा संचालित एग्रीगेटर " ब्लॉग समाचार " http://janokti.feedcluster.com/ से भी अपने ब्लॉग को अवश्य जोड़ें .

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